गुरुवार, 10 जून 2010

और दिल को थाम लिया

उसने जब कभी महफ़िल मे कोंई भी नाम लिया

जाने क्यों चुभन हुयी,और दिल को थाम लिया

उसकी जफ़ाओ को भी हमने वफा समझ करके

अपनी बरबादी का खुद पे "मीत" इल्जाम लिया


रोहित कुमार "मीत"

शुक्रवार, 7 मई 2010

चूमकर मेरे बालो को सहलाता कौन है

चूमकर मेरे बालो को सहलाता कौन है

मेरे हर गम मे मुझको बहलाता कौन है

शिद्दत और तड़प के फूल चढ़ाकर "मीत"

आसुवो से मेरे कब्र को नहलाता कौन है

                                  रोहित कुमार "मीत"

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

जारी है एक सफ़र मेरा





जारी है एक सफ़र मेरा तीरगी के साथ

जंग चल रही है मेरी रौशनी के साथ



मुझे मालूम नहीं कि क्या सोच कर

मै खुद भी रो दिया बेबसी के साथ



ताज़ा हुए है जख्म मेरे फिक्र कीजिये

जब से मिला वो मुझे बेरुखी के साथ



पैमाने मै तुझको यू उदास देखकर

मैकदे से घर गया तिशनगी के साथ



होसलो तुम भी मेरे संग- संग चलो

जंग चल रही है मेरी जिंदगी के साथ



तीरगी/ अँधेरा

तिशनगी / प्यास

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

दिल को मिला सुकून उसने भुला दिया





दिल को मिला सुकून उसने भुला दिया

ये बात और है कि मुझको रुला दिया



इस शहर मे कोई मुझे जानता ना था

फिर किसने रुसवाई को मेरा पता दिया



पास तेरा एक ख़त था निशानी के तौर

मगर आज तो हमने उसे भी जला दिया



चाक जिगर और आँखों मे मेरे अश्क

उसने मेरी वफ़ा का कुछ तो सिला दिया



टूट के बिखर-बिखर गए है यादो के पत्ते

किसने माजी के दरख्तों को हिला दिया



रो देते है बात- बात मे हँसते हुए भी हम

"मीत" इश्क ने तेरे क्या-क्या सिखा दिया



रोहित कुमार "मीत"

शनिवार, 21 नवंबर 2009


घर नही पर घर का नक्सा बनाते रहे

हकीकत को अपनी किस्सा बनाते रहे


जमी ही मिली ओढ़ने को उन्हें भी

फलक पे जो अपना आशिया बनाते रहे


कुछ लोग चाँद पे जाके लोट भी आए

हम घर तक जाने का रास्ता बनाते रहे


हकीकत हो या कोई हो ख्वाब "मीत"

फ़िर भी अंजान एक रिश्ता बनाते रहे

बदलो का चाँद भी शर्मसार हुवा है


जब से उसे आपका दीदार हुवा है


हर पल गुमसुम बेखुद यार हुवा है


शायद उसे भी तुमसे प्यार हुवा है

तन्हाई का हमने यू इन्तिजाम किया है

कि तेरी यादो का फ़िर एक जाम लिया है


नज़र आई है जब-जब तू मुझे पैमाने में

हमने झुक-झुक के तुझे सलाम किया है


दिल खोल के पी पर बहके नही कदम

हमने मैकदे का भी एहतराम किया है


मेरी तिशनगी से तू ना उलझ ये दरिया

मैंने समंदर का भी काम तमाम किया है